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Sunday, April 9, 2017

आदियोगी: दूर उस आकाश की गहराइयों में

दूर उस आकाश की गहराइयों में एक नदी से बह रहे हैं, आदियोगी शून्य सन्नाटे टपकते जा रहे हैं, मौन से सब कह रहे हैं आदियोगी.
योग के स्पर्श से अब योगमय करना है तन मन.
सांस शाश्वत सनन सननन, प्राण गुंजन घनन घननन, उतरे मुझमे आदियोगी.
योग धारा चलत छन छन सांस शाश्वत सनन सननन प्राण गुंजन घनन घननन उतरे मुझमे आदियोगी.
इश दो अस्तित्व मेरा और कर दो चुरा चुरा, पूर्ण होने दो मुझे और होने दो अब पूरा-पूरा.
भस्म वाली रस्म कर दो आदियोगी योग उत्सव रंग भर दो आदियोगी.
बज उठे यह मन सीतारी झनन झननन झनन झननन.
सांस शाश्वत सनन सननन, प्राण गुंजन घनन घननन. उतरे मुझमे आदियोगी.
योग धारा चलत छन छन सांस शाश्वत सनन सननन प्राण गुंजन घनन घननन उतरे मुझमे आदियोगी. 

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